Thursday, November 24, 2011

होता है हर मजिल का सफ़र

होता है हर मजिल का सफ़र ये मालूम है मुझे
मुझको मेरी मंजिल का सफ़र मगर मिलता नहीं|

होना है फ़ना एक दिन जलके ये मालूम है मुझे
मुझको तेरी महफ़िल का पता मगर मिलता नहीं|

होते है जुदा मुसाफिर मोड़ पे ये मालूम है मुझे
मुझको मेरी ज़िन्दगी का मुकाम मगर मिलता नहीं|

होता है महसूस धडकनों को दर्द ये मालूम है मुझे
मुझको तेरी पलकों का किनारा मगर मिलता नहीं

होता है हर लम्हे में सदियों का अहसास ये मालूम है मुझे
मुझको मेरी मौत का वक़्त मगर मिलता नहीं|

होती है आहट के सीने पे ये मालूम है मुझे
मुझको तेरी ख़ामोशी का सहारा मगर मिलता नहीं|

बड़ी मुश्किल-सी कोई बात.

बड़ी मुश्किल-सी कोई बात, भई आसान होती है
अगर इंसानी फ़ितरत की, हमें पहचान होती है
हुजूमे-ग़म जो आ जाए, हुजूमे-शाद हो ऐ दिल
ग़मों से लड़ के ही तो, ज़िंदगी आसान होती है
कहा करते हैं दौलत में, बहुत अच्छइयाँ होतीं
ये जो हो हाथ में शैतान के, शैतान होती है
बड़ी सरमाया है नेकी हज़ारों नेकियाँ कर लो
यहाँ तक एक भी नेकी कभी ताबान होती है
अगर खुशियाँ ही खुशियाँ हों तुम्हें महसूस होगा रंज
मुसलसल रौशनी भी दर्द का सामान होती है।

हक़

हुस्न की धूप, प्यार की बयार दे दो तुम,
ऐ खुदा ! वो सुबह एक बार दे दो तुम ।

उसको पाकर ही मेरे दिल को चैन आएगा
मेरा सुकून वो मेरा करार दे दो तुम |

शहर फिजूल है, ये शहर अपने पास रखो
इंतेजा है कि बस कूचा-ए-यार दे दो तुम |

बड़े दिनों के हैं ताल्लुकात तेरे मेरे
दोस्ती निभाओ, अमां यार दे दो तुम |

मेरे जीने का फैसला तुझे ही करना है
मुझे घर दो चाहे मज़ार दे दो तुम |

मेरा हक़ है जो मांगा है मैंने तुझसे खुदा
मैंने कब मांगा के मुझको उधार दे दो तुम | ~S.VIKRAM

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Sunday, November 20, 2011

वक़्त पड़ने पे वही लोग बदल जाते हैं

मिल भी जाते हैं तो कतरा के निकल जाते हैं
हाय !! मौसम की तरह दोस्त बदल जाते हैं

हम अभी तो हैं गिरफ्तार-ए-मोहब्बत यारो
ठोकरें खा के सुना था कि संभल जाते हैं

ये कभी अपनी जफा पर न हुआ शर्मिन्दा
हम समझते रहे पत्थर भी पिघल जाते हैं

उम्र भर जिनकी वफाओं पे भरोसा कीजे
वक़्त पड़ने पे वही लोग बदल जाते हैं

--बशीर बद्र

न थी दुश्मनी किसी से, तेरी दोस्ती से पहले

हमें कोई गम न था, गम-ए-आशिकी से पहले
न थी दुश्मनी किसी से, तेरी दोस्ती से पहले

ये है मेरी बदनसीबी, तेरा क्या कुसूर इसमें
तेरे गम ने मार डाला, मुझे जिंदगी से पहले

मेरा प्यार जल रहा है, ए चाँद आज छुप जा
कभी प्यार कर हमें भी, तेरी चांदनी से पहले

ये अजीब इम्तेहान है, कि तुम्ही को भूलना है
मिले कब थे इस तरह हम, तुम्हे बेदिली से पहले

न थी दुश्मनी किसी से, तेरी दोस्ती से पहले

--फैयाज़ हाशमी

उसकी आदत है, वो अपनों को भुला देता है

जाने किस चीज़ की वो मुझको सज़ा देता है
मेरी हँसती हुई आँखों को रुला देता है

किसी तरह बात लिखूं दिल की उससे, वो अक्सर
दोस्तों को मेरे खत पढ़ के सूना देता है

सामने रख के निगाहों के वो तस्वीर मेरी
अपने कमरे के चरागों को बुझा देता है

मुद्दतों से तो खबर भी नहीं भेजी उसने
उसकी आदत है, वो अपनों को भुला देता है

--वसी शाह

Saturday, November 19, 2011

कुछ ख्याल तन्हा दिल के

खूशहाल  हूँ  - अब मेरी तवियत का मुझे कोई परवाह नहीं ,
तन्हा हूँ - मेरे इर्द-गिर्द  कोई दोस्त-ओ-खैरख्वाह नहीं ... ( खैरख्वाह = wellwishers )
ज़िंदगी को यूँ ही जीया मैं हंसी-मज़ाक़ के जरिये
ग़मगीन ज़ीश्त-ओ-मौत को वैसे भी कोई हमराह नहीं ...
लोग फिसल जाते हैं अक्सर इक नज़र की तरावट पे -
उस चोट का ज़ख्म नहीं भरता - यूँ करता कोई आगाह नहीं ... (  आगाह = warn , alert )
हर इक शाम को एक सहेर है ये कहते  हैं लोग मगर -
फिर क्यूँ मेरे शब्-ए-हिज्र को अब तक कोई सबाह नहीं ... ( सबाह = dawn , daybreak )
अहल-ए-वफ़ा-ओ-उल्फत से हम करते रहे इश्क ता-उमर
जिस्म मिले थे सब के सब - कंही कोई अरवाह नहीं ... ( अरवाह = souls , spirits )
बदी के राह सैंकड़ों हैं और सफ़र भी उस पे  है आसाँ
नेकी के तंग गलियों में पर होता कोई गुमराह नहीं ...
- रणजीत